Monday, May 18, 2009

"अहसास "

तलाशती है नज़रे तुम्हे, हंशी फीजाओ में ;
पा के तुम्हे खालिपान का अह्शाश दीलाती है!

हवा के ये झोंके कुछ हंशी याद दीलाती है;
तुझसे की हुई बाते याद आती है!

तेरे हंशी की खनक है इन हवाओ में ;
जो, एक संगीत सा मधुर तान सुनती है!

इन हवाओ में खुशबु की कमी सी लगती है ;
ये, तुम्हरे ना होने का अहसास दीलाती है!

झील के कीनारे कोई 'परी' नही दीखती है;
ये तुम्हारे ना होने का अहसास दीलाती है!

यु ही बस हर वक्त जुदाई सी लगती है....................

3 comments:

  1. तेरे हंशी की खनक है इन हवाओ में ;
    जो, एक संगीत सा मधुर तान सुनती है!

    वाह सुबोध जी...........अच्छा लिखा है........मन की भावों को कागज़ पर उतारना भी एक कला है...........आप परिपूर्ण हैं सफल हैं इस कला में

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  2. subodh ji aapne toh kamaal hi kar diya hai..aap toh logo ki andhurini ahsaas ko jaan gaye hai...waaah

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