तलाशती है नज़रे तुम्हे, हंशी फीजाओ में ;
न पा के तुम्हे खालिपान का अह्शाश दीलाती है!
हवा के ये झोंके कुछ हंशी याद दीलाती है;
तुझसे की हुई बाते याद आती है!
तेरे हंशी की खनक है इन हवाओ में ;
जो, एक संगीत सा मधुर तान सुनती है!
इन हवाओ में खुशबु की कमी सी लगती है ;
ये, तुम्हरे ना होने का अहसास दीलाती है!
झील के कीनारे कोई 'परी' नही दीखती है;
ये तुम्हारे ना होने का अहसास दीलाती है!
यु ही बस हर वक्त जुदाई सी लगती है....................
तेरे हंशी की खनक है इन हवाओ में ;
ReplyDeleteजो, एक संगीत सा मधुर तान सुनती है!
वाह सुबोध जी...........अच्छा लिखा है........मन की भावों को कागज़ पर उतारना भी एक कला है...........आप परिपूर्ण हैं सफल हैं इस कला में
subodh ji aapne toh kamaal hi kar diya hai..aap toh logo ki andhurini ahsaas ko jaan gaye hai...waaah
ReplyDeleteak acha pryas .badhai
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