जरा गौर फरमाइयेगा! ये एक वैसे मन की बाते है जो थोडा अशांत है या यु कहे की कुछ समझ नहीं पा रहा है और कुछ कहना चाह रहा है!
ये मन"
कुछ बीते लम्हों की याद करता, सोचता,
क्यों वर्तमान को भी भूल जाता है ये मन!
ये मन चंचल-नटखट-था-या-है,
क्यों ये समझ न पाता है ये मन!
काजल सी अँधेरी रातो में खुली आँखों से,
ना जाने! क्या देखता.... क्या ढूंढता.... क्या पाता.... है ये मन!
हसीं 'परी' के सपनो में खोया रहता था ये मन.............
क्या? खो गयी है वो 'परी' या खुद खो गया है ये मन!
कुछ अधूरे सपने....कुछ टूटे और बिखरे सपने,
ना जाने क्यों अब भी उन सपनो के सपने देखता है ये मन!
रूठ जाये या मनाये.....या मना के रूठ जाये.....
पर क्यों और किसको ये समझ ना पाता है ये मन!
विचलीत...वीराम चाहता है ये मन,
ना चाहते हुए भी क्यों घबराता है ये मन!
ना जाने क्या चाहता है ये मन..................
sunder abhivyakti.
ReplyDeleteकुछ अधूरे सपने....कुछ टूटे और बिखरे सपने,
ReplyDeleteना जाने क्यों अब भी उन सपनो के सपने देखता है ये मन!
bahut sundar, yatharth se bhari rachna..
lagta hai kisi ne mann ki bat juban pr la di.
thanks
ना जाने क्या चाहता है ये मन....achchi kavita.
ReplyDeletebahut sundar Rachna ...
ReplyDeleteना जाने क्या चाहता है ये मन.......
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