Wednesday, April 29, 2009

इक मुलाकात

ख्वाबो में इक मुलाकात हूई,
हां पहली बार हूई;

उस 'परी ' से मुलाकात हूई,
आँखों-आँखों में कुछ बात हूई;

ना जाने क्या बात हूई,
उनकी हंशी से मुलाकात हूई;

जुल्फे थी खुली हूई,
हवा के झोंको से उड़ती हूई;

होठ गुलाब सी खीली हूई,
पंखुडियों सी मीली हूई;

चाँद की चांदनी साथ हूई,
'परी ' दीलके पास हूई;

दील में ऐशी कुछ बात हूई,
हमें भी कुछ अहशास हूई;

पर............

ख्वाबो की ये बात थी,
नींद खुली तो रात थी..................

Tuesday, April 28, 2009

'मै'

ख्वाबो की इश दूनीया में ,
खोया रहता हूँ 'मैं '


पाने की चाहत में,
ख़ुद को खोने लगा हूँ 'मैं '

चाहत की दूनीया में,
खोने लगा हूँ 'मैं '

महशूश करता हूँ 'मैं '
कुछ न कहता हूँ 'मैं '
फीर भी ना जाने , क्यू,
खुश रहता हूँ 'मैं '


खुली आँखों से
सपने देख पाता हूँ 'मैं '
सपनो की चाह हैं,
पर सो न पाता हूँ 'मैं '

कारिबियो की चाह है दील में
पर करीब जा न पाता हूँ 'मैं '


शायद यही हूँ 'मैं '......................

Friday, April 24, 2009

एक ख्वाब देखा है मैंने
इस बार देखा है मैंने,

सपनो में है सजाया
दील में है बशाया ,
कहना तो कुछ चाह
लेकीन कह न पाया,

एक ख्वाब देखा है मैंने
इस बार देखा है मैंने,

उस्को ना बताया की
तुझे दील में है बसाया,
सोचा,
कह दू उशे, पर कह न पाया,

एक ख्वाब देखा है मैंने
इस बार देखा है मैंने,

सपनो में आ के, वो
मुझको सताये,
अपनी हंशी से
वो मुझको हंशाये ,

एक ख्वाब देखा है मैंने
इस बार देखा है मैंने

उशकी हंशी जब याद आए
दील में कुछ ख्वाब जगाये,
कुछ कहना तो वो भी चाहे
पर कह न पाये,

एक ख्वाब देखा है मैंने
इस बार देखा है मैंने,